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मानसिक गुलामी-भारत की दुर्दशा का सबसे बड़ा कारण

कभी-कभी मैं सोचता हूं  क्या भारत आज सच में आजाद है मुझे तो लगता है भारत आज भी गुलाम है लेकिन इस गुलामी से हर कोई  ग्रसित नहीं है लेकिन ज्यादातर सेक्युलर ओर ब्रांडेड मानसिकता रखने वाले लोग इस मर्ज़ के शिकार हैं जिसका नाम है  मानसिक गुलामी।
मानसिक गुलामी एक बीमारी है जिसका शायद ही कोई इलाज हो दुनिया में,आज हमारे देश का दुर्भाग्य ही कहिये की सबसे ज्यादा मानसिक गुलाम भारत में ही पाए जाते हैं। आज मैं यह बात सिर्फ इसलिए कह रहा हूं  क्योंकि जितना मैंने इस देश के  लोगों को और उनकी मानसिकता को समझने का प्रयास किया है उतना ही उतना ही उलझता गया हूँ कि आखिर क्या कारण है कि हम इस कदर विदेशी संस्कृति के प्रभाव से ग्रसित होते जा रहे हैं मैं किसी एक के क्षेत्र में नहीं बल्कि हर उस विधा के विषय में बात कर रहा हूँ जहां देशी चीजों को दरकिनार करते हुए विदेशी चीजों को महत्व दिया जाता है,हम खुद अपने देश को महत्वहीन ओर विदेशों को महत्वूवर्ण बताने पर तुले हुए हैं।
इस वैदेशिक गुलामी का शिकार होना या इस बीमारी से ग्रसित होना लाजमी है क्योंकि जिस देश की शिक्षा प्रणाली प्रबंधन विदेशी शिक्षा संस्कृति को बढ़ावा देता हो उनसे देश को देश की संस्कृति को महत्वपूर्ण बताने की उम्मीद कैसे की जा सकती है।हमारा इसिहास हमें बताता है कि हमारी शिक्षा प्रणाली आज भी उस अंग्रेज लार्ड मैकाले के द्वारा बनाये गए नियमों के आधार पर संचालित होता है जिसके देश देशवासियों ने मिलकर हमारे देश पर 200 से ज्यादा वर्षों तक शाशन किया और भारतीयों पर अत्याचार और दुराचार की सारी सीमाएं लांघ दीं और उससे भी अधिक अचंभित करने वाली बात ये है कि हमें उन विदेशी मुस्लिम आक्रांताओं के विषय में पढ़ाया जाता है जिनके द्वारा ना सिर्फ हमारी सनातन संस्कृति को समाप्त करने का प्रयास किया गया वल्कि हमारी अमूल्य धरोहरों को भी मिटाया गया। उन दुराचारियों ने लगभग 700वर्षों तक हमारी संस्कृति को नुकसान पहुँचाया,हमारी भावनाओं को चोट पहुंचाई,हमारे लाखों मंदिर तोड़े,हमें आपस। में लड़वाया,हमारी बहु-बेटियों की इज्जत से खेलने का प्रयास किया और इसिहास उन्हें महान बताकर आज हमारी युवा पीढ़ी ओर बच्चों को उनके बारे में सिखाया जाता है,जबकि अपनी संस्कृति को बचाने के लिए संघर्ष करने वाले,इन आक्रांताओं के खिलाफ खड़े होकर उन्हें धूल चटाने वाले महान योद्धाओं ओर वीर पुरुषों को इसिहास में संकुचित कर दिया गया।
हमारे महान महर्षियों के कठिनतम तपोबल के द्वारा किये गए ज्ञानार्जन के आधार पर लिखे गए वेद-पुराणों ओर स्मृतियों को पाखंड बताना ओर ज्योतिष के द्वारा किये गए आने वाले भविष्य के अनुभवों को अंधविश्वास बताकर उनकी महत्ता को कम कर देना यही तो चाहता था लार्ड मैकाले ओर वह अपनी योजना में सफल भी हुआ,हमारे कमजोर ओर विदेशी मानसिकता के षणयंत्र के आधार पर रचे गए शिक्षण प्रणाली को निरंतर ढो रहे हैं और दिन दिन विदेशी मानसिकता के लाइलाज रोग से ग्रसित होते जा रहे हैं।
आज हमारे देश में ईसाई मिशनरी के द्वारा संचालित किए जाने वाले अंग्रेजी माध्यम के स्कूलो को सर्वश्रेष्ठ माना जाता है,अंग्रेजी को सबसे महान भाषा माना जाता है,अंग्रेजी का ज्ञान रखने वाले देशवासियों को मूर्ख ओर गंवार समझा जाता है,ठीक इसके उलट हमारी संस्कृति पहचान जननी मातृभाषा संस्कृत का देश से विलोप होता जा रहा है तो हमारी मातृभाषा हिंदी को हम खुद महत्व नहीं देते, हिंदी माध्यम से शिक्षण प्राप्त करने वाले विद्यार्थियों से भेदभाव किया जाता है,उनको हमेशा नीचा दिखाने का प्रयास किया जाता है, ठीक वैसे ही हम आधुनिक सुविधाओं से परिपूर्ण उत्पादों की चाह में विदेशी उत्पादों का अंधाधुंध प्रयोग करते हैं,आज हम उन पर आश्रित हो चुके हैं हम इस कदर विदेशी मानसिकता से ग्रसित हैं कि हम हमारे देश में उत्पादित वस्तुओं का उपयोग सिर्फ इसलिए नहीं करते क्योंकिं हम  अपने दिमाग में बिठा चुके हैं कि हमारे देश में उत्पादित कोई भी वस्तु हो,सेवा हो,ज्ञान हो या दवाई हो हम उसपर विश्वास नहीं करेंगें बल्कि उसकी खिल्ली उड़ाएंगे,परिहास करेंगें।
क्या इसी तरह हम भारत संयुक्त राष्ट्र संघ का स्थायी सदस्य बनबायेंगें?? भाई उसके लिए देश की इज्जत बहुत जरूरी होती है ओर जिस देश कब नागरिक ही उसकी इज्जत करते हों उसकी इज्जत कोई और देश कैसे करेगा??
मदर टेरेसा ईसाई थी इसलिए उसके छू देने मात्र से कैंसर जैसी जानलेवा बीमारी ठीक। हो जाती थी, ये बात इसी देश में मानी गई और सिर्फ मानी नही गयी बल्कि उसे भारत का सर्वोच्च सम्मान भी प्रदान कर दिया गया जबकि इसी देश में चिकित्सा की पहचान रहा आयुर्वेद जिसने सनातन धर्म के माध्यम से विश्व में चिकित्सा व्यवस्था की नींव रखी उसी आयुर्वेद के आधार पर बनाई गई कोरोनिल औषधि का हम तिरस्कार कर रहे हैं उसका मजाक बना रहे हैं।अरे भाई यदि ये द्वता सफल होती है तो हमें नाज करना चाहिए हमारे देश पर, आयुर्वेद पर, हमारे देश के वैधराज पर, डॉक्टरों की टीम पर लेकिन हम उसके विपरीत उनका मजाक बनाकर उनका मोरल डाउन कर रहे हैं, उन्हें हतोत्साहित कर रहे हैं क्या यही हमारा कर्तव्य है??
यदि यही दवा चीन,अमेरिका, ब्रिटेन या कोई और पश्चिमी देश बना लेता तो भी आप इसी प्रकार सवाल जबाब करते या फिर वैक्सीन ओर दवा पाने के लिए दूने दाम भी आसानी से दे देते।।
भाई इसको ही मानसिक गुलामी कहते हैं इससे बाहर निकलिए हमारे देशी उत्पाद भले ही कम गुणवत्तापूर्ण हों लेकिन हमें प्राथमिकता के साथ उन्हीं का उपयोग करना चाहीये क्योंकिं तभी तो उनकी गुणवत्ता में सुधार होगा और हमारे उत्पादों में भी आधुनिकता ओर सुविधाओं का भंडार होगा और धीरे धीरे कीमत भी कम हो जाएगी।।

निवेदन है मेरा इस मानसिक गुलामी से छुटकारा पाइए क्योंकि इसका इलाज सिर्फ आपकी द्रण इच्छाशक्ति ही है इसके अलावा कुछ नहीं।आप ठान ले तो असंभव भी कुछ नही।।

जय हिन्द,जय भारत


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